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माता पिता

माता-पिता !

 

ये शब्द सुनते ही आंखों के सामने जो मूर्ति उभर कर आती है, वो त्याग, ममता और समर्पण से भरपूर होती है। यूं तो हर इंसान के लिए उसके माता-पिता खास होते हैं,पर मेरे मां पापा की खासियत सिर्फ उनका प्यार नहीं बल्कि उनकी महत्वाकांक्षा और ढ़ृढ निश्चय है। मेरी मां एक छोटे-से गांव से थीं, शादी के बाद जब वो पापा के घर आईं तो उन्हें दादी के दबंग शासन के तले रहना पड़ा। वो तो फिर भी उन्होंने झेल लिया। पर फिर एक के बाद एक हुई चार बेटियों की वजह से उन्हें दादी, बुआ, चाचा और चाची से जो कठोर व्यवहार झेलना पड़ा, उसका असर उनकी सेहत पर पडने लगा। फिर भी सबकी नजरों में वापस इज्जत पाने की चाह में बार बार प्रेग्नेंट होती रहीं, लेकिन उनका शरीर इतना छिन्न हो चूका था, कि हर बार उनका गर्भपात होता रहा और उनकी स्थिति काफी नाजुक हो गयी थी। तब मेरे पापा जिन्होंने कभी दादी के खिलाफ आवाज नहीं उठायी थी, उन्होंने दो टुक में सबको कह दिया, उनके लिए बेटे से ज्यादा, बेटियों की मां जरुरी हैं। और उनकी बेटियाँ ही उनके लिए बेटे हैं। किसी को उनका बोझ उठाने की जरूरत नहीं है। वो अकेले ही सबको संभाल सकते हैं। सिर्फ यही नहीं उन्होंने मेरे चाचाजी, जिनके एक बेटी और दो बेटे हैं, उन्हें कहा कि अगर वो अपनी एक बेटी के लिए चार घंटे काम करेंगे तो वो अपनी चार बेटियों के लिए 16 घंटे काम करेंगे पर उनसे कम नहीं रखेंगे। मां पापा हम चार बेटियों और थोड़ी सी जमापूंजी लेकर अलग हो गए। और फिर शुरु हुई उनकी जिंदगी की जद्दोजहद। फिर से घर बसाने से लेकर, बिजनेस की शुरुआत, सब एक नये सिरे से करना था। पापा की मदद करने के लिए मां भी अपने घर का काम खत्म करके दुकान पर बैठने लगी। ये देखकर उनके बारे में कितनी ही अफवाहें दादी और चाचा ने फैलाई, आज लिखने में भी शर्म आती है। इन सबके बावजूद वे दोनों अपने दम पर बिजनेस बढाने में लगे रहे और इन सबके बीच, उनके मन में एक इच्छा पनपने लगी कि क्यों न बेटियों को इस काबिल बनाएं कि वो किसी पर आश्रित न रहें और समाज को दिखाएं कि बेटियां बेटों से कम नहीं। हालाँकि तब उन्हें ये भी पता नहीं था कि ये सब होगा कैसे। जहां खाने पहनने को भी पैसे पुरे नहीं पड रहे थे। वहां अब एक और खर्च। पर कहते हैं न जहां चाह वहां राह। मां के पास कुछ गहने थे, वह बेचकर बिजनेस में लगा दिया। खुद ही गेहुं चावल चुनने लगी, ताकि मजदूरी बच जाए और साफ अनाज के ज्यादा पैसे मिल जाए। वडी, नमकीन बनाकर दुकान में बेचने लगी। इसी तरह के और भी याद नहीं कितने ही उपाय लगाए, ताकि हम बहनों के पढने का खर्च चल सके। धीरे धीरे जिंदगी अपने पहिए पर दौड़ने लगी। हम बहनों ने भी पुरी कोशिश की कि उनके सपनों को पूरा कर सके। जब हम आगे की पढ़ाई करने के लिए बाहर गए, तब सबने मां पापा से कहा, उन्हें बाहर मत भेजो वरना बिगड़ जाएंगी या इतना पढाओगे तो इनके लायक लडका कहां मिलेगा या फिर शादी के लिए पैसे कहां से लाओगे। पर मां पापा ने इन सारी चिंताओं को दरकिनार कर के सिर्फ हमारी पढाई पर ध्यान दिया। आज उनके ही मेहनत और निश्चय का फल है कि हम सारी बहनें इंजीनियर डाक्टर बनकर अपने पैरों पर खड़ी हैं। इतना ही नहीं उन्होंने समाज की सभी रीतियों कुरीतियों को निभाते हुए, अपनी सारी जमीन जायदाद बेचकर हमारी शादी अच्छे से अच्छे घरों में करायीं। हमारी दादी तो नहीं रहीं पर जिस चाचाजी ने हम बेटियों की वजह से मां पापा से रिश्ता तोड़ लिया था, वो हमारे मायके जाने पर हमसे मिलने भी आते हैं और घर भी बुलाते हैं। हमारे मां पापा और हम बहनों की आज सभी मिसालें देते हैं। हम बहनों के पति भी उन्हें इतना प्यार और सम्मान देते हैं कि वे सबसे कहते फिरते हैं कि उन्होंने बेटियों को विदा नहीं किया, बल्कि बेटे घर लाएं हैं। इन सबसे बड़ी बात तो यह है कि इतना पाने के बाद भी उनमें लेश मात्र भी घमंड नहीं है। बल्कि वह सबकी मदद करने को तत्पर रहते हैं, खासकर अगर किसी लड़की की पढ़ाई या शादी में मदद की जरूरत हो। तो बताइये हैं ना हमारे मां पापा कुछ अलग और कुछ ज्यादा ही खास। मुझे गर्व है कि ये मेरे मां पापा हैं।